प्रेम की प्रकृति

बून्द जो गिरी कोरे कोरे मन पे तो

देख यह बात बदली मुस्कुरा गई

अधूरी सी चाहते, प्यासी सी तरंग थी जो,

पाई स्वाति बून्द जो, पत्तियों की पोरो पर वो भी भरमा गई

,

,

कारी कारी बदली थी, घन घनश्याम जैसे

पुष्प पे गिरी तो फिर पंखुड़ी की धार शरमा गई

,

,

देख के चकोर मन, चाँद और चाँदनी भी

बादलों की ओट पाके, मोर मन अग्नि भी और गरमा गई
#मन

#yeh_jindagi

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नकली लोग

वफ़ा करते हैं #नकली सी

असली इनके दावे हैं

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ये चेहरे हैं झूठ के सारे

झूठे इनके पहनावे हैं

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दवा करते हैं नकली सी

#असली इनके कारनामे हैं

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ये चेहरे हैं झूठ के सारे

झूठे इनके पहनावे हैं

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मनगढ़ंत हैं किस्से इनके

करते झूठे दिखावे हैं

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ये चेहरे हैं झूठ के सारे

झूठे इनके पहनावे हैं

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.

मन

#yeh_jindagi

जाने भी दो…

दर्द जब हद से बढ़ जाये

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कुछ बूँदो को फिर

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बह #जाने_भी_दो

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ख्वाबों का समन्दर है

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कुछ ख्वाब गर आँखों में ही रह जाये

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तो रह #जाने_भी_दो

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दिल चिर रही हैं ये चुप्पियाँ

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कुछ तुम कहो, कुछ हमें

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कह #जाने_भी_दो 

•मन•

#yeh_jindagi

प्रकृति सरंक्षण

मधुमास की

मृदु आस लिये

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दृढ संकल्पित

एक विश्वास लिए

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शीतलछाया पाने हेतु

आओ एक यज्ञ साकार करें

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एक वृक्ष लगा हम

हर प्राणी का उद्धार करें

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धरती जलती धु धु कर

जीवन भी जलता जाता है

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सावन पाकर भी

धरा का आँचल कोरा ही रह जाता है.

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आओ बून्द सहेजे

बीज को रोपे, अपना फर्ज निभाते हैं

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प्रकृति से पाया है इतना

अब उसका कर्ज चुकाते हैं.

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©मन

#yeh_jindagi

कब तक रहूँ

कैद इन चार दीवारों में

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अब जल रहा है मन

आत्मबोध के उद्गारों में

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कहने को आजाद हैं हम

पर अब भी बंधन से कहाँ मुक्त हुए

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हर नारी को इज्जत की दृष्टि से देखे

ऐसी नजरों से कहाँ हम युक्त हुए

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जिधर देखो नृशंस भेड़िये

जिस्म पर लार टपकाते हैं

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कुत्ते भर की भी औकात नहीं

देखो फिर भी इंसान  कहलाते हैं

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•मन•

#yeh_jindagi

जीवन समर

रचना पर आपके अनमोल विचार जरूर दें…आभार रहेगा..🙏🙏🙏🙏

विदाई

रीत विदाई की

मुझे अपने घर से पराया कर गई

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कल तक जिस घर की थी

आज उसी में एक मेहमान हो गई

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भाभी कहती हैं, 

यहाँ अपने घर जैसे मत करो

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कुछ कहना चाहती हूँ, मैं भी भाभी

इस घर से विदा हुई हूँ, जुदा नहीं हुई

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आपसे पहले मैंने इस घर को, अपने नेह से सिंचा है

आप भी विदा होकर आई हैं फिर मुझ पर इस रेखा को क्यों खिंचा है

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•मन•

#yeh_jindagi